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'शुरू में कई लोगों ने तो मुझे मना कर दिया,' नौकरी छूटी तो बदली राह, 25 हजार से काम, आज 70 लाख का टर्नओवर

Updated on 16-07-2026 12:09 PM
नई दिल्‍ली: रविंद्र जी. बेंगलुरु के रहने वाले हैं। पहले वह फार्मास्युटिकल प्रोफेशनल रहे हैं। साल 2014 में वीजा की दिक्कतों के कारण उनकी जमी-जमाई नौकरी छूट गई। वह चार साल तक बेरोजगार रहे। हार मानने के बजाय उन्‍होंने कृषि सेक्‍टर में कुछ नया करने की ठानी। न्यूट्रिशन की पढ़ाई के दौरान उन्हें 'माइक्रोग्रीन्स' (Microgreens) के फायदों के बारे में पता चला। इसके बाद उन्होंने अक्टूबर 2019 में अपने स्टार्टअप की शुरुआत की। इसका नाम 'mU Greens and Greens' है। कड़ी मेहनत और 12-लेवल वर्टिकल फार्मिंग तकनीक के दम पर आज रविंद्र सिर्फ एक छोटे से बेसमेंट से केमिकल-मुक्त माइक्रोग्रीन्स उगाकर सालाना 70 लाख रुपये का शानदार रेवेन्यू जेनरेट कर रहे हैं। आइए, यहां रविंद्र जी. की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।

ऐसे आया जिंदगी में टर्न

रविंद्र जी. मुंबई में जन्मे और पले-बढ़े। उन्‍होंने जूलॉजी में बीएससी की। फिर बेंगलुरु का रुख किया। अपने करियर की शुरुआत एक प्लास्टिक फैक्ट्री में नाइट शिफ्ट ऑपरेटर के रूप में की। इसके बाद उन्होंने अरबिंदो फार्मा में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के रूप में काम किया। बाद में एमबीए की डिग्री हासिल कर फ्यूचर हेल्थ डायग्‍नोस्टिक जैसी कंपनियों में एवीपी सेल्स के पद तक पहुंचे। साल 2014 में अमेरिका जाने की योजना के तहत उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। लेकिन, वीजा प्रक्रिया में देरी के कारण उनकी योजना धरी की धरी रह गई। वह करीब चार साल तक बेरोजगार रहे। इस कठिन दौर में उनका आत्मविश्वास डगमगाया। लेकिन, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। रिस्क कम रखते हुए छोटे स्तर से हाइड्रोपोनिक्स और खेती में हाथ आजमाने का फैसला किया। उन्होंने शुरुआत स्थानीय सब्जी विक्रेताओं को घर पर उगाए गए स्प्राउट्स (अंकुरित अनाज) के छोटे पाउच बेचकर की। इससे उनका मंथली रेवेन्‍यू 75,000 रुपये तक पहुंचने लगा।

25 हजार रुपये से शुरुआत

रविंद्र की जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया जब उन्होंने अपनी मां को घर पर व्हीटग्रास उगाते देखा। उन्होंने 2018 में व्हीटग्रास के साथ प्रयोग शुरू किए। अक्टूबर 2019 में आधिकारिक तौर पर अपनी कंपनी mU Greens and Greens को रजिस्टर्ड कराया। यहां 'mU' ग्रीक अक्षर 'माइक्रो' को दिखाता है। रविंद्र ने भारी-भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करने के बजाय अपनी मां के घर के महज 50 से 60 वर्ग फीट के बेसमेंट का इस्तेमाल किया। 13 फीट ऊंची छत का फायदा उठाकर उन्होंने महज 25,000 से 30,000 रुपये के शुरुआती निवेश से रैक्स, ट्रे और लाइट्स लगाकर 12-लेवल का एक सघन वर्टिकल फार्मिंग सिस्टम तैयार कर लिया। आज यह सेटअप बेंगलुरु के सबसे छोटे लेकिन सबसे ऊंचे शहरी फार्मों में से एक है। वहां से हर हफ्ते 150 से 170 किलो केमिकल-फ्री माइक्रोग्रीन्स का उत्पादन किया जा रहा है।

सामने आईं कई चुनौतियां

एक इंटरव्‍यू में रविंद्र ने कहा, 'शुरुआत में ज्‍यादातर दुकानदारों ने मुझे मना कर दिया था क्योंकि उनके पास पहले से ही भरोसेमंद वेंडर थे। इसलिए मैंने खुद अपनी डिस्प्ले स्पेस को साफ और व्यवस्थित करना शुरू किया। मेरे इस छोटे से प्रयास ने उन्हें प्रभावित किया और आखिरकार वह मेरे सबसे बड़े समर्थक बन गए।' इस स्टार्टअप में सूरजमुखी, मटर, ब्रोकली, सरसों और चार प्रकार की मूली जैसी 10-15 लोकप्रिय वैरायटी उगाई जाती हैं। रविंद्र इसके लिए बेहद वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाते हैं। इसमें बीजों को हाइड्रोजन पेरोक्साइड से सैनिटाइज करने, 8 घंटे भिगोने, 4 दिन के ब्लैकआउट पीरियड में रखने और फिर 12 से 16 घंटे फुल-स्पेक्ट्रम ग्रो लाइट्स में रखने जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए कटाई से एक दिन पहले पानी देना बंद कर दिया जाता है। चूंकि माइक्रोग्रीन्स बेहद संवेदनशील और जल्दी खराब होने वाले होते हैं। इसलिए कंपनी सिर्फ बेंगलुरु में 5 किमी के दायरे में ही हाइपर-लोकल डिलीवरी करती है। ग्राहकों का भरोसा जीतने के लिए रविंद्र ने बकायदा डाइटीशियन्स और न्यूट्रिशनिस्ट्स के साथ पार्टनरशिप की है। यह उनके सब्सक्रिप्शन मॉडल वाले ग्राहकों को मुफ्त न्यूट्रिशन कंसल्टेशन प्रदान करते हैं।

यह है बिजनेस मॉडल

बिजनेस मॉडल की बात करें तो यह स्टार्टअप B2B (रिसॉर्ट्स) और B2C (200 से अधिक फिक्स्ड ग्राहक) दोनों मॉडल्स पर काम करता है। माइक्रोग्रीन्स की एक ट्रे या बॉक्स की कीमत 199 रुपये है। आज माइक्रोग्रीन्स की बिक्री से हर महीने 4 से 6 लाख रुपये की कमाई होती है। वहीं, रविंद्र की ओर से चलाए जाने वाले 12-हफ्तों के विशेष एग्रीप्रेन्योरशिप ट्रेनिंग प्रोग्राम से लगभग 2 लाख रुपये महीना अतिरिक्त आते हैं। इस तरह उनका सालाना रेवेन्यू 70 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। खास बात यह है कि शहर से आने वाले बड़े ऑर्डर्स को वह खुद पूरा करने के बजाय उन्हीं किसानों को सौंप देते हैं जिन्हें उन्होंने खुद ट्रेनिंग दी है। भविष्य के लिए रविंद्र की योजना माइक्रोग्रीन्स को फ्रीज-ड्राई करके पाउडर फॉर्मेट में बदलने की है ताकि इसकी शेल्फ लाइफ बढ़ सके। साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी शुद्ध ऑर्गेनिक न्यूट्रिएंट्स के रूप में सप्लाई की जा सके।



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