भारत-चीन एक पलड़े में खड़े, रूसी सप्लाई को बदलना मुश्किल, अमेरिका का ये कदम बना रहा कई समीकरण
Updated on
16-07-2026 12:12 PM
नई दिल्ली: रूसी कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका के प्रस्तावित टैरिफ से ग्लोबल ऑयल मार्केट में नई अस्थिरता आ सकती है। लेकिन, सीमित अतिरिक्त प्रोडक्शन क्षमता और जारी जियोपॉलिटिकल जोखिमों को देखते हुए रूसी सप्लाई को बदलना मुश्किल होगा। केप्लर के एक एनालिस्ट ने ये बातें कहीं।
केप्लर के एनालिस्ट सुमित रितोलिया के अनुसार, 'रूसी कच्चा तेल देश की सबसे मजबूत एनर्जी सिक्योरिटी हेज बन गया है। खासकर होर्मुज स्ट्रेट में रुकावटों के बाद से।'
मंगलवार को अमेरिकी सीनेटरों ने रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले एक संशोधित द्विदलीय बिल का अनावरण किया। इसमें रूसी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाए जाएंगे। साथ ही रूसी तेल और गैस आयात करने वाले देशों पर प्रस्तावित टैरिफ में ढील दी जाएगी।
एक तराजू में खड़े भारत और चीन
यह उपाय चीन और भारत सहित रूसी एनर्जी के पांच सबसे बड़े खरीदारों पर अधिकतम टैरिफ को अप्रैल 2025 में पेश किए गए मूल बिल में प्रस्तावित 500 फीसदी से घटाकर 100 फीसदी कर देता है। यह उन देशों को भी छूट देता है जो रूस के नेचुरल गैस निर्यात का 15 फीसदी से कम आयात करते हैं, अगर वे उन खरीद को कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं
26 लाख बैरल रोज की तेल सप्लाई
रितोलिया ने कहा कि रूस ने जून में भारत को लगभग 26 लाख बैरल प्रति दिन (mbd) कच्चा तेल सप्लाई किया। यह देश के कुल कच्चे तेल आयात का आधे से अधिक था। मार्च के बाद से आयात लगातार बढ़ा है। वहीं, जुलाई में आने वाली मात्रा जून के स्तर के बराबर या उससे अधिक होने की उम्मीद है।
उन्होंने कहा कि रूसी कच्चे तेल ने ग्लोबल ऑयल मार्केट में एक स्थिर करने वाली ताकत के रूप में भी काम किया है। यह देखते हुए कि पहले के प्रतिबंधों को रूसी तेल की सप्लाई बनाए रखने के लिए डिजाइन किया गया था। मकसद यह था कि बाजार से प्रतिदिन लाखों बैरल तेल हटने और कीमतों में भारी बढ़ोतरी से बचा जा सके।
रूसी एक्सपोर्ट को बदल पाना मुश्किल
रितोलिया ने कहा, 'अगर 100 फीसदी के सेकेंडरी टैरिफ... को इस तरह से लागू किया जाता है कि रूसी कच्चे तेल की खरीद में काफी कमी आती है तो बाजार को पहले एक सरल सवाल का जवाब देना होगा- रिप्लेसमेंट बैरल कहां से आएंगे?'
उन्होंने कहा कि सीमित अतिरिक्त प्रोडक्शन क्षमता, होर्मुज स्ट्रेट के आसपास लगातार जोखिम और सीमित वैकल्पिक सप्लाई के कारण तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के बिना बड़े पैमाने पर रूसी निर्यात को बदलना मुश्किल होगा।
रितोलिया ने कहा कि भारत के लिए समान मात्रा, विश्वसनीयता और लागत पर रूसी कच्चे तेल की जगह लेने में सक्षम विकल्प सीमित हैं। इससे मौजूदा बाजार स्थितियों में रूसी बैरल सप्लाई का सबसे व्यावहारिक स्रोत बन गए हैं।
उन्होंने कहा कि प्रस्तावित टैरिफ से भू-राजनीतिक अनिश्चितता तो बढ़ती है। लेकिन, इनका कार्यान्वयन और ग्लोबल कच्चे तेल के प्रवाह पर इनका प्रभाव अभी भी अनिश्चित है। उन्होंने चेतावनी दी कि कोई भी ऐसी नीति जो रूसी निर्यात को काफी हद तक बाधित करती है, पहले से ही सीमित तेल बाजार को और भी तंग कर सकती है। इसके नतीजे भारत से परे भी फैल सकते हैं।
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