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पश्चिम एशिया संकट, तेल, सोना... रुपये में क्यों आई गिरावट? वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गिनाए कारण

Updated on 15-06-2026 01:01 PM
नई दिल्ली: रुपये की कीमत में डॉलर के मुकाबले हाल में काफी गिरावट देखने को मिली। इसे रोकने के लिए आरबीआई ने कई कदम उठाए। इस बीच केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपये में होने वाले उतार-चढ़ाव कई वैश्विक और घरेलू कारकों से प्रेरित होते हैं। इनमें भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं, विदेशी पूंजी की आवाजाही और कच्चे तेल, उर्वरक तथा सोने पर भारत की आयात निर्भरता शामिल है। उन्होंने जोर देकर कहा कि रुपये के एक्सचेंज रेट को किसी निश्चित स्तर पर बनाए रखने के लिए नहीं, बल्कि बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए ही हस्तक्षेप करता है।

मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में बेंगलुरु के निकट देवनहल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान संवाददाताओं से बातचीत में सीतारमण ने कहा कि विनिमय दरें विभिन्न वैश्विक घटनाक्रमों और बाजार की परिस्थितियों से प्रभावित होती हैं। उन्होंने कहा कि कच्चे तेल, उर्वरक और सोने के आयात के लिए भारत को बड़ी मात्रा में डॉलर का भुगतान करना पड़ता है, जिससे विदेशी मुद्रा प्रबंधन का महत्व बढ़ जाता है

आरबीआई का हस्तक्षेप

सीतारमण ने कहा, 'जब भी रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव या अस्थिरता आती है, तब भारतीय रिजर्व बैंक बाजार में हस्तक्षेप करता है। उसका उद्देश्य विनिमय दर को किसी निश्चित स्तर पर बनाए रखना नहीं, बल्कि अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना होता है। आरबीआई बाजार में आकर स्थिति को स्थिर करता है और फिर बाहर हो जाता है। इसके लिए वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करता है। इसलिए वह ऐसा सीमित और आवश्यकता पड़ने पर ही करता है।'
वित्त मंत्री ने कहा कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति से जुड़े फैसले, वैश्विक मुद्राओं में उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेश की निकासी जैसे कारक रुपये की विनिमय दर को प्रभावित करते हैं। उन्होंने कहा, 'रुपये की विनिमय दर और उसमें होने वाला उतार-चढ़ाव कई कारणों से प्रभावित होता है। इनमें वैश्विक अनिश्चितताएं, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि या कटौती के संकेत, डॉलर के मुकाबले जापानी येन और दक्षिण कोरियाई वॉन जैसी मुद्राओं में गिरावट शामिल हैं। विभिन्न देशों की मुद्राओं के बीच विनिमय दर अनेक कारकों से निर्धारित होती है।'

मुनाफावसूली

सीतारमण ने कहा कि अमेरिका में आर्थिक घटनाक्रमों के कारण एफआईआई और एफडीआई द्वारा मुनाफावसूली कर धन निकालने तथा अन्य बाजारों में अंतरित करने का भी विदेशी मुद्रा भंडार और मुद्रा विनिमय दरों पर असर पड़ता है। उर्वरक सब्सिडी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, 'कोविड काल से ही हम किसानों को उर्वरक की एक बोरी 300 रुपये में उपलब्ध करा रहे हैं। कोविड के बाद जब इसे विदेशों से आयात किया गया तो एक बोरी की कीमत 3,000 रुपये तक पहुंच गई थी। इसका मतलब है कि सरकार प्रत्येक किसान को प्रति बोरी लगभग 2,700 रुपये तक की सब्सिडी दे रही है।'
कर्नाटक सरकार द्वारा केंद्र पर राज्य को उसका उचित हिस्सा नहीं देने के आरोपों पर सीतारमण ने कहा कि राज्यों को धन का आवंटन केंद्र सरकार नहीं बल्कि वित्त आयोग तय करता है। उन्होंने कहा, 'इसका सिद्धांत प्रधानमंत्री मोदी या भारत सरकार तय नहीं करती। वित्त आयोग सभी राज्यों का दौरा कर विभिन्न मानकों के आधार पर निर्णय करता है। एक बार निर्णय हो जाने के बाद अगले पांच वर्षों तक केंद्र सरकार को उसी के अनुसार राज्यों को राशि देनी होती है।'

राज्यों को टैक्स

राज्यों को उनके द्वारा दिए गए सभी कर वापस मिलने की दलील को खारिज करते हुए उन्होंने कहा, 'अगर बेंगलुरु और कर्नाटक कर में योगदान देते हैं और यह उम्मीद करें कि सारा पैसा वापस मिल जाए, तो यह सिद्धांत इस तरह काम नहीं करता।' अर्थव्यवस्था पर उन्होंने कहा कि आधिकारिक आंकड़े और वैश्विक संस्थाएं लगातार भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बता रही हैं।

उन्होंने कहा, 'पिछले पांच-छह वर्षों से भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना हुआ है। इस वर्ष जारी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों में विनिर्माण, कृषि, सेवा, लॉजिस्टिक और परिवहन सहित सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।'

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