अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर थिंक टैंक की चेतावनी, भारत इसलिए न करे जल्दबाजी
Updated on
09-05-2026 12:35 PM
नई दिल्ली: थिंक टैंक जीटीआरआई ने शुक्रवार को चेतावनी दी। उसने कहा कि भारत को अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) में जल्दबाजी करने से बचना चाहिए। वजह यह है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कानूनी रूप से विवादित टैरिफ व्यवस्था अमेरिकी अदालतों में लगातार कमजोर पड़ रही है। जीटीआरआई ने आगाह किया कि अगर नई दिल्ली ने बदले में कोई ठोस टैरिफ फायदे हासिल नहीं किए तो उसे 'एकतरफा' समझौते से ही संतोष करना पड़ सकता है।
यह चेतावनी तब आई जब अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय व्यापार अदालत ने 'ट्रेड एक्ट 1974' के सेक्शन 122 के तहत ट्रंप की ओर से लगाए गए 10% ग्लोबल टैरिफ को रद्द कर दिया। यह फैसला प्रशासन की आक्रामक टैरिफ स्ट्रैटेजी के लिए एक और बड़ा झटका था। 7 मई को 2-1 के बहुमत से दिया गया यह फैसला 20 फरवरी को टैरिफ लागू होने के 50 दिन से भी कम समय के भीतर आया।
MFN टैरिफ फ्रेमवर्क की ओर धकेल रहे कोर्ट के फैसले
जीटीआरआई के अनुसार, यह फैसला ट्रंप-युग के व्यापार उपायों के लिए दूसरी बड़ी न्यायिक असफलता है। इससे पहले, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन के रेसिप्रोकल टैरिफ को अमान्य घोषित कर दिया था। कुल मिलाकर ये दोनों फैसले अमेरिका को उसकी पारंपरिक 'विश्व व्यापार संगठन' (WTO) से जुड़ी 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' (MFN) टैरिफ फ्रेमवर्क की ओर वापस धकेल रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, 'अमेरिकी टैरिफ पॉलिसी को लेकर जारी अनिश्चितता भारत के लिए किसी भी लॉन्ग टर्म ट्रेड कमिटमेंट को सही ठहराना मुश्किल बना देती है। इसमें ट्रंप-युग के प्रमुख टैरिफ को अदालतें बार-बार रद्द कर रही हैं।'
टैरिफ बने चूहे-बिल्ली का खेल
जीटीआरआई ने तर्क दिया कि वॉशिंगटन का व्यापार रवैया लगातार अप्रत्याशित होता जा रहा है।
प्रशासन टैरिफ शक्तियों को बनाए रखने के लिए एक तंत्र से दूसरे कानूनी तंत्र की ओर रुख कर रहा है।
भारतीय थिंक टैंक ने इसे 'बिल्ली-चूहे का खेल' करार दिया।
इसमें व्हाइट हाउस टैरिफ लगाने के लिए किसी एक कानून का सहारा लेता है।
लेकिन, जब अदालतें हस्तक्षेप करती हैं तो वह तुरंत दूसरे कानून की ओर मुड़ जाता है।
हालिया फैसला 'ट्रेड एक्ट 1974' के सेक्शन 122 पर केंद्रित है। यह एक ऐसा प्रावधान है जो अमेरिकी राष्ट्रपति को भुगतान संतुलन के गंभीर संकट के दौरान कांग्रेस की मंजूरी के बिना 150 दिनों तक 15% तक टैरिफ लगाने की अनुमति देता है।हालांकि, व्यापार अदालत ने फैसला सुनाया कि प्रशासन ने कानून के तहत मिली शक्तियों का उल्लंघन किया है। अदालत ने कहा कि सेक्शन 122 को भुगतान संतुलन की आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए बनाया गया था। न कि व्यापक टैरिफ के जरिए व्यापार घाटे को कम करने के एक औजार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए।
शुरू से कमजोर है टैरिफ का कानूनी आधार
जीटीआरआई ने कहा कि टैरिफ का कानूनी आधार शुरू से ही कमजोर था। 1973 से ही अमेरिका एक 'फ्री-फ्लोटिंग डॉलर सिस्टम' के तहत काम कर रहा है। ऐसे सिस्टम में व्यापार असंतुलन को आमतौर पर आयात पर रोक लगाने के बजाय करेंसी के उतार-चढ़ाव और पूंजी के प्रवाह के जरिए ठीक किया जाता है।रिपोर्ट में कहा गया है, 'अमेरिका लगातार बड़े व्यापार घाटे का सामना कर रहा है। फिर भी वह भारी विदेशी निवेश आकर्षित कर रहा है। कारण है कि डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे मजबूत रिजर्व करेंसी है।'
अदालत का यह फैसला अभी सिर्फ इस मामले के याचिकाकर्ताओं पर लागू होता है। इसमें वाशिंगटन राज्य, मसालों के आयातक 'बर्लैप एंड बैरल' और खिलौना कंपनी 'बेसिक फन' शामिल है। इसका मतलब है कि दूसरे आयातकों के लिए टैरिफ अभी भी लागू रहेंगे। जबकि प्रशासन 'यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट' में अपील करेगा।
ग्लोबल ट्रेड का समीकरण बदल रहे कोर्ट के फैसले
फिर भी जीटीआरआई ने कहा कि बार-बार आने वाले ऐसे न्यायिक फैसलों से ग्लोबल ट्रेड के समीकरण बदलने लगे हैं।
संस्था ने कहा, 'दुनिया के सबसे बड़े बाजार में टैरिफ को लेकर ऐसी अनिश्चितता से कारोबारियों के लिए भी अनिश्चितता पैदा होती है। वैश्विक सप्लाई चेन में रुकावट आती है। मैन्युफैक्चरर्स और कंज्यूमर्स के लिए लागत बढ़ जाती है।'
इस थिंक टैंक ने यह चेतावनी भी दी कि ट्रंप प्रशासन अब स्टील, सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल, दवा और जरूरी खनिजों जैसे क्षेत्रों के खिलाफ 'सेक्शन 301' की जांच और 'सेक्शन 232' के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े टैरिफ जैसे ज्यादा टारगेटेड ट्रेड उपायों का इस्तेमाल तेज कर सकता है।जीटीआरआई ने कहा कि यह कानूनी अनिश्चितता पहले से ही व्यापार वार्ताओं पर असर डाल रही है। उसने मलेशिया के उस फैसले का जिक्र किया, जिसमें उसने अमेरिका के साथ होने वाले एक व्यापार समझौते से पीछे हटने की बात कही थी। जबकि दूसरे देश भी वाशिंगटन के साथ अपने संबंधों का फिर से आकलन कर रहे हैं।
भारत को क्या नुकसान हो सकता है?
भारत के लिए यह चिंता ज्यादा बुनियादी है। जीटीआरआई ने तर्क दिया कि अमेरिका अभी अपने 'एमएफएन' (सबसे पसंदीदा राष्ट्र) टैरिफ कम करने को तैयार नहीं है। जबकि वह साथ ही साथ भारत पर एक प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते के तहत कई क्षेत्रों में टैरिफ कम करने या पूरी तरह हटाने का दबाव डाल रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है, 'ऐसी परिस्थितियों में किसी भी व्यापार समझौते के एकतरफा होने का खतरा रहता है। इसमें भारत को बदले में कोई ठोस टैरिफ लाभ मिले बिना ही बाजार तक स्थायी पहुंच की रियायतें देनी पड़ सकती हैं।'
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि भारत को वाशिंगटन के साथ कोई भी बड़ा व्यापार समझौता करने से पहले अमेरिका के एक ज्यादा स्थिर और कानूनी रूप से भरोसेमंद व्यापार ढांचा तैयार करने का इंतजार करना चाहिए।
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