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पेट्रोल बचाने या सोना कम खरीदने से दूर नहीं होगी रुपये की कमजोरी, जानें कहां है असली समस्या

Updated on 23-05-2026 02:35 PM
रुपये के अवमूल्यन और बाजार की उठापटक के बीच अक्सर सुनने में आता है कि आयात कम करो, पेट्रोल बचाओ, सोना कम खरीदो, विदेश में घूमने की बजाय देश में घूमो। ऐसी सलाह पहली नजर में तो सही लगती हैं, लेकिन इनकी दिक्कत यह है कि ये असल मसले को नहीं पकड़ती! सच तो यह है कि रुपया इसलिए कमजोर नहीं हो रहा क्योंकि भारतीय खर्च बहुत कर रहे हैं। दरअसल, हम पूंजी बाजार की समस्या को कारोबार की समस्या मान रहे हैं, जबकि असली मुद्दा पूंजी के प्रवाह और वित्तीय ढांचे की कमजोरी है, जिसका असर समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

इंडेक्स और रुपये के हालात

इस साल निफ्टी 50 इंडेक्स करीब 11% गिर चुका है और प्रमुख वैश्विक सूचकांकों में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वालों में है। दक्षिण कोरिया का KOSPI लगभग 50% ऊपर है, ताइवान का TAIEX 48% और जापान का Nikkei 18% ऊपर है। साल की शुरुआत में एक डॉलर की वैल्यू 89.86 रुपये थी, जो अब 96 के करीब है। यानी रुपया पांच महीने में 6.5% कमजोर हुआ है। RBI के दखल के बावजूद रुपये में गिरावट नहीं थमी और फॉरेन पोर्टफोलियो निवेशकों का बाजार से पैसा निकालने का सिलसिला जारी है।

कहां है असली समस्या?

भारत की समस्या मांग या बचत नहीं, बल्कि पूंजी के गलत वितरण की है। AI, विनिर्माण, रक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में अवसर हैं, लेकिन निवेश की कमी है। विदेशी निवेशकों को भारत ऐसा बाजार नहीं लगता जहां वे आसानी से निवेश, विस्तार और सुरक्षित एग्जिट कर सकें। वे कारोबार में जोखिम तो उठा सकते हैं, लेकिन नीतिगत अनिश्चितता से बचना चाहते हैं। नियमों में बार-बार बदलाव और पूंजी निकासी में मुश्किलात के कारण वे सिंगापुर-दुबई जैसे बाजारों को प्राथमिकता देते हैं।

टाइगर ग्लोबल का मामला

हाल ही में ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट से अमेरिका की दिग्गज निवेश कंपनी टाइगर ग्लोबल ने 1.6 बिलियन डॉलर की अपनी हिस्सेदारी बेची और उसे इस पर मोटा टैक्स (14,500 करोड़ रुपये) चुकाना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कंपनी को अपने मुनाफे पर भारत में टैक्स भरना होगा। कोर्ट ने 2017 से पहले किए गए निवेशों पर भी GAAR (General Anti-Avoidance Rules) को लागू माना।

निवेशकों में गया गलत संदेश

कानूनी रूप से यह फैसला सही हो सकता है, लेकिन निवेशकों में इससे गलत संदेश गया। फ्लिपकार्ट-वॉलमार्ट डील ने भारत में रिटर्न की संभावना तो दिखाई, पर यह धारणा भी बनी कि भारत में नियम अस्थिर हैं और उनकी व्याख्या बदली जा सकती है। विदेशी निवेश का बड़ा हिस्सा लिक्विड और इंडेक्स-लिंक्ड फंड्स में है, जिन्हें तेजी से खरीदा बेचा जा सकता है।

उपाय भी हैं मौजूद

रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप, NOP लिमिट और TCS जैसी नीतियां रुपये की गिरावट और कैपिटल आउटफ्लो को कुछ समय के लिए धीमा कर सकती हैं, लेकिन वे मूल समस्या को हल नहीं करती। ऐसा सिस्टम होना चाहिए जहां निवेशक लगभग एक साथ एग्जिट न करें! अगर विदेशी पूंजी केवल शेयर बाजार में नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक्स, हेल्थकेयर जैसे वास्तविक कारोबारों में लगे तो निवेशक बाजार की घबराहट नहीं बल्कि कारोबार के प्रदर्शन पर फैसले लेंगे। इससे रुपये व बाजार पर अचानक दबाव नहीं पड़ेगा। भारत की GDP में सर्विसेज, हेल्थकेयर, लॉजिस्टिक्स का 22% योगदान है, लेकिन इनमें विदेशी निवेश सीमित है।

शॉर्ट टर्म उपाय

रुपये की गिरावट को रोकने के लिए तुरंत प्रभाव से अगले 90 दिनों में आवश्यक कदम उठाए जाएं। पहला, ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी ताकि विदेशी पूंजी यहीं बनी रहे। दूसरा, सरकार स्पष्ट करे कि 2024 से पहले के निवेशों पर नए GAAR या ट्रांसफर प्राइसिंग मामले नहीं खोले जाएंगे, इससे FPI का भरोसा बढ़ेगा। तीसरा, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सरकारी मंजूरी जल्दी मिलें। चौथा, सेबी के नियमों में बार-बार बदलाव से निवेशकों में अनिश्चितता पैदा होती है। सेबी कम से कम दो तिमाही के लिए नए नियम न लाए। पांचवां, RBI को बाजार में हस्तक्षेप और अपनी नीति को लेकर स्पष्ट संकेत देने चाहिए।

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