भारत के लिए खुलेगा होर्मुज का गेट, ईरान से बातचीत के बाद ये है बड़ी तैयारी, इसलिए बना है सस्पेंस
Updated on
21-05-2026 12:40 PM
नई दिल्ली: भारत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते जहाज भेजने की तैयारी कर रहा है। इसका मकसद मिडिल ईस्ट के सप्लायरों से कच्चे तेल और ऊर्जा कार्गो की सप्लाई सुनिश्चित करना है। ईरान युद्ध के कारण पैदा हुई बाधाएं ग्लोबल एनर्जी मार्केट्स पर लगातार दबाव डाल रही हैं। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में इसकी जानकारी दी गई है। मामले से परिचित लोगों के हवाले से एजेंसी ने यह रिपोर्ट दी है। वैसे यह सस्पेंस बना हुआ है कि भारतीय जहाजों को सुरक्षित मार्ग देने पर ईरान या अमेरिका ने सहमति दी है या नहीं। दोनों ही देश स्ट्रेट के अंदर और आसपास अपने-अपने तरीके से कंट्रोल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन योजनाओं को अंतिम रूप दे दिया गया है। सरकार से अंतिम मंजूरी मिलते ही भारतीय जहाज इस संकरे पानी के रास्ते को पार करने का प्रयास शुरू कर देंगे।
हालांकि, रिपोर्ट में जिन लोगों का जिक्र किया गया है, उन्होंने इन शिपमेंट के समय या इस रास्ते से गुजरने वाले कार्गो की मात्रा के बारे में कोई खास जानकारी नहीं दी।
क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज स्ट्रेट?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री 'चोकपॉइंट' में से एक है।
ग्लोबल ऑयल फ्लो का यह लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है।
ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद से इस रास्ते से होने वाली जहाजों की आवाजाही में भारी कमी आई है।
इससे सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं।
तीसरा सबसे बड़ा क्रूड इंपोर्टर है भारत
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है। हाल के वर्षों में रूस और अन्य सप्लायरों से अपनी खरीद बढ़ाने के बावजूद खाड़ी क्षेत्र से होने वाली एनर्जी सप्लाई पर ही काफी हद तक निर्भर बना हुआ है।
रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी स्वामित्व वाली 'शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया' (एससीआई) फरस की खाड़ी में अपना परिचालन फिर से शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार है। बशर्ते उसे भारतीय नौसेना से मंजूरी मिल जाए और घरेलू तेल रिफाइनरियों से कमर्शियल ऑर्डर हासिल हो जाएं।
इसे लेकर बना हुआ है सस्पेंस
हालांकि, इस बात को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या ईरान या अमेरिका ने भारतीय जहाजों को सुरक्षित मार्ग देने पर औपचारिक रूप से सहमति जताई है या नहीं। ये दोनों ही देश स्ट्रेट के अंदर और उसके आसपास अलग-अलग तौर पर प्रतिबंध और सैन्य नाकेबंदी लागू कर रहे है।
ईरान और भारत की हुई थी बातचीत
यह घटनाक्रम विदेश मंत्री एस. जयशंकर की ओर से नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची से मुलाकात करने के कुछ ही दिनों बाद सामने आया है।
दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के साथ समुद्री व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर इसके पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा की। इसमें होर्मुज की मौजूदा स्थिति भी शामिल थी।
इस मुलाकात के बाद अराघची ने कहा कि ईरान इस जलमार्ग से सुरक्षित कमर्शियल आवाजाही सुनिश्चित करने के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। ईरानी मंत्री ने कहा, 'ईरान हमेशा होर्मुज में सुरक्षा के रक्षक के तौर पर अपने ऐतिहासिक कर्तव्य का पालन करता रहेगा।'उन्होंने आगे कहा, 'ईरान सभी मित्र राष्ट्रों का एक भरोसेमंद साझेदार है, जो अपने वाणिज्य की सुरक्षा के मामले में ईरान पर पूरी तरह भरोसा कर सकते हैं।'
इस बयान के जरिए उन्होंने भारत जैसे उन देशों को भरोसा देने का प्रयास किया, जो तेल सप्लाई में आने वाली बाधाओं को लेकर चिंतित हैं।
उन्होंने आगे कहा, 'हमने कई भारतीय जहाजों को गुजरने की इजाजत दी है। सभी जहाजों का सुरक्षित गुजरना हमारी नीति है। हमारे हित में भी है। साथ ही, अमेरिका की तरफ से नाकेबंदी और उनकी आक्रामकता की वजह से इस इलाके में असुरक्षा का माहौल है।'ईरानी अधिकारियों ने पहले संकेत दिया था कि तेहरान भारत समेत 'मित्र देशों' के साथ मिलकर काम करेगा ताकि चल रहे तनाव के बावजूद होर्मुज के रास्ते कमर्शियल आवाजाही को आसान बनाया जा सके।
भारतीय नौसेना की बढ़ी है मौजूदगी
जैसे-जैसे शिपिंग सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। भारत ने इस इलाके में अपनी नौसेना की मौजूदगी काफी बढ़ा दी है।
ब्लूमबर्ग के मुताबिक, भारतीय नौसेना ने आसपास के पानी में तैनात युद्धपोतों की संख्या दोगुनी कर दी है। होर्मुज स्ट्रेट के आसपास की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए हवाई निगरानी अभियान तेज कर दिए हैं।
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