जो लोग प्रिवेंटिव अरेस्ट (एहतियाती गिरफ्तारी) के प्रावधानों को लेकर चिंता जता रहे हैं, उन्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है। प्रशासन कानून के मुताबिक काम करेगा और कानून का किसी भी तरह से गलत इस्तेमाल नहीं होगा।
इस बिल में यह बताया गया है कि असामाजिक गतिविधि क्या है और 'गुंडा' किसे माना जाएगा। साथ ही, इसमें ऐसे लोगों को एक साल से ज़्यादा समय के लिए किसी खास 'इलाके, जिले या जिलों' में घुसने से रोकने का प्रावधान भी है।
पश्चिम बंगाल के एंटी गुंडा बिल में क्या है
- ' एंटी गुंडा बिल' के अनुसार, अगर ज़िला मजिस्ट्रेट, पुलिस कमिश्नर या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत DIG रैंक का कोई पुलिस अधिकारी यह आशंका जताता है कि कोई 'गुंडा' असामाजिक गतिविधियों में शामिल है या शामिल हो सकता है, तो वे इसे रोकने के लिए उस व्यक्ति को आदेश दे सकते हैं कि वह आदेश में बताए गए इलाके, ज़िले या जिलों (या उनके किसी हिस्से) से बाहर चला जाए। यह काम आदेश में तय समय के भीतर करना होगा।
- साथ ही, उसे एक साल से ज्यादा समय के लिए उस इलाके में घुसने या वापस आने से रोका जा सकता है। इसके अलावा, उस व्यक्ति को अपनी गतिविधियों या अपनी मौजूदगी की जानकारी आदेश में बताए गए तरीके, समय और अधिकारी को देनी पड़ सकती है।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने खारिज कर दी याचिका
- 6 अगस्त को, कलकत्ता हाई कोर्ट की एक डिवीज़न बेंच (जिसमें जस्टिस तापब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस पार्थ सारथी चटर्जी शामिल थे) ने इस बिल को चुनौती देने वाली तीन जनहित याचिकाओं (PIL) को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ये याचिकाएं समय से पहले दायर की गई थीं क्योंकि बिल को कानून बनने के लिए अभी तक राष्ट्रपति की मंज़ूरी नहीं मिली थी।
- हालांकि, हाई कोर्ट की टिप्पणियां और राज्य सरकार के अपने बयान, अधिकारी (Adhikari) के बार-बार किए गए सार्वजनिक दावों के उलट हैं।
- अधिकारी ने कई बार दावा किया था कि 'गुंडा दमन बिल' को गवर्नर की मंजूरी मिल चुकी है और वह कानून बन गया है। उन्होंने विधानसभा में यह भी कहा था कि 24 जुलाई को एस्प्लेनेड में हुए विरोध मार्च के दौरान हिंसा भड़काने के आरोपी सभी लोगों के खिलाफ 'गुंडा दमन एक्ट' लागू किया गया था।
- हालांकि, राज्य सरकार ने अब हाई कोर्ट को बताया है कि बिल को अभी भी राष्ट्रपति की मंज़ूरी का इंतजार है और इसलिए यह अभी तक कानून नहीं बना है।