इंश्योरेंस कंपनियों के दावों की खुलेगी पोल, IRDAI बदलने जा रहा है क्लेम सेटलमेंट का ये बड़ा नियम
Updated on
26-05-2026 01:11 PM
नई दिल्ली: भारतीय बीमा नियामक IRDAI ने नॉन-लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों से कहा है कि वे बीमा क्लेम की एक सटीक परिभाषा तय करें। साथ ही क्लेम सेटलमेंट रेशियो को मापने का तरीका भी सभी कंपनियों के लिए एक जैसा करने को कहा गया है। दरअसल, अभी अलग-अलग कंपनियां अपनी सुविधा के अनुसार क्लेम की परिभाषा तय कर रही हैं, जिससे ग्राहकों को सही तस्वीर नहीं मिल पाती।
कंपनियां क्या करती हैं?
अभी होता यह है कि कुछ इंश्योरेंस कंपनियां क्लेम की जानकारी मिलते ही उसे रजिस्टर कर लेती हैं। कुछ कंपनियां पहले यह देखती हैं कि पॉलिसी के तहत पैसा देना बनता भी है या नहीं, तब उसे क्लेम मानती हैं।
आम आदमी के लिए 'सेटल्ड' क्लेम का मतलब है कि उसे उसका पैसा मिल गया। लेकिन कुछ बीमा कंपनियां उन क्लेम्स को भी 'सेटल्ड' (निपटाया हुआ) मान लेती हैं जिन्हें उन्होंने कागजात की कमी की वजह से बंद कर दिया है। या जिन्हें पॉलिसी के दायरे में न होने के कारण रिजेक्ट कर दिया है। इससे कागजों पर तो कंपनी का रेकॉर्ड अच्छा दिखने लगता है, लेकिन असलियत में ग्राहकों को उनका हक नहीं मिल पाता।
कंपनियां अक्सर ग्राहकों से फुल एंड फाइनल सेटलमेंट के वाउचर पर साइन करा लेती हैं, भले ही ग्राहक संतुष्ट न हो। क्लेम की परिभाषा इसलिए भी अहम है क्योंकि इसी से कंपनी के मुनाफे का हिसाब लगता है।
लोगों की क्या है परेशानी?
IRDAI के पूर्व सदस्य के. के. श्रीनिवासन का कहना है कि असल मायने में क्लेम तभी सेटल माना जाना चाहिए जब ग्राहक यह मान ले कि उसका काम हो गया है। जब तक ग्राहक संतुष्ट नहीं होता, क्लेम को पेंडिंग ही माना जाना चाहिए। अगर कंपनी क्लेम खारिज करती है, तो ग्राहक 3 साल के भीतर उसे कानूनी चुनौती दे सकता है। जब तक कोर्ट का फैसला नहीं आता और कंपनी उसका पालन नहीं करती, तब तक उसे अनसेटल्ड (न निपटाया हुआ) ही गिना जाना चाहिए।
एक जैसी परिभाषा क्यों जरूरी?
इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों ने बताया कि जनरल इंश्योरेंस काउंसिल ने इस बारे में अपने सुझाव IRDAI को सौंप दिए हैं। मकसद यह है कि हर कंपनी के अलग-अलग तरीकों के बजाय एक साफ और पारदर्शी व्यवस्था बने, जिससे पता चल सके कि कौन सी कंपनी ग्राहकों के क्लेम निपटाने में कितनी ईमानदार है।
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