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भारत के रईसों के लिए अमेरिका से आती थी बर्फ, 'आइस किंग' के कारोबार की दिलचस्प कहानी

Updated on 01-06-2026 02:49 PM
नई दिल्‍ली: रेफ्रिजरेटर आम होने से बहुत पहले भारत अमेरिका से बर्फ मंगाता था। अमेरिका के न्यू इंग्लैंड के तालाबों से निकाली गई जमी बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े भारत में आयात किए जाते थे। यहां तक बोस्टन के एक कारोबारी ने इस व्‍यापार से भारत में करोड़ों की कमाई की। उन्‍हें 'आइस किंग' के नाम से जाना जाता था।

लगभग चार दशकों तक भारत के अमीर लोग अपने ड्रिंक्स को ठंडा करने और बीमारों का इलाज करने के लिए न्यू इंग्लैंड से जहाजों से लाई गई सर्दियों में जमी हुई बर्फ के टुकड़ों का इस्तेमाल करते थे।
यह एक बड़ा लॉजिस्टिकल कारनामा था। इसमें 16,000 मील से ज्‍यादा का सफर तय करना, भूमध्य रेखा को दो बार पार करना और समंदर में चार महीने का थका देने वाला सफर शामिल था। 1800 के दशक की यह सबसे दिलचस्प वैश्विक व्यापार कहानियों में से एक बन गया।

आंकड़ों से समझिए कितना फायदेमंद था व्यापार

यह व्यापार इतना फायदेमंद था कि बोस्टन के एक कारोबारी फ्रेडरिक ट्यूडर ने सिर्फ कलकत्ता (अब कोलकाता) के बाजार से ही दो दशकों में लगभग 2,20,000 डॉलर का शुद्ध मुनाफा कमाया। यह आज के हिसाब से 56 करोड़ रुपये से भी ज्‍यादा है।

फ्रेडरिक को बाद में 'आइस किंग' के नाम से जाना गया। अपने चरम पर इस अनोखे कारोबार ने पूरे एशिया और ऑस्ट्रेलिया में 3,53,000 टन से ज्‍यादा अमेरिकी बर्फ पहुंचाई।

भारत अमेरिका से क्‍यों इंपोर्ट करता था बर्फ?

आधुनिक मैकेनिकल रेफ्रिजरेशन से पहले भारत जैसे उष्णकटिबंधीय औपनिवेशिक देश में अच्छी क्‍वालिटी की बर्फ मिलना बहुत मुश्किल और महंगा काम था। यह व्यापार पर्यावरण, औपनिवेशिक और चिकित्सीय कारणों के एक अनोखे मेल की वजह से खूब फला-फूला।

1. स्थानीय विकल्पों की कमी

जहां मुगल ऐतिहासिक रूप से घोड़ों पर लादकर हिमालय से बर्फ नीचे लाते थे। वहीं अंग्रेजों को यह प्रक्रिया लॉजिस्टिकल तौर पर बहुत थका देने वाली और महंगी लगी।

स्थानीय बर्फ को 'हुगली आइस' के नाम से जाना जाता था। सर्दियों की ठंडी रातों में वह उथले गड्ढों में वाष्पीकरण की प्रक्रिया से बड़ी मेहनत से बनाई जाती थी। हालांकि, यह बर्फ पतली, गीली, कंकड़-पत्थरों से भरी होती थी। पीने या खाने के बिल्कुल लायक नहीं होती थी।

2. प्‍योरिटी और लग्‍जरी की डिमांड

अंग्रेज औपनिवेशिक अफसर और अमीर भारतीय अपने देश जैसी चीजों और विलासिता के लिए तरसते थे। उन्हें खाना ताजा रखने, आयातित वाइन को ठंडा करने और आइसक्रीम बनाने के लिए एकदम साफ, ठोस बर्फ के टुकड़ों की जरूरत होती थी।

कारोबारी जमशेदजी जीजीभोय को इस बात का श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने ही सबसे पहले मुंबई की एक डिनर पार्टी में अमेरिकी बर्फ का इस्तेमाल करके आइसक्रीम परोसी थी।

3. चिकित्सीय जरूरत

बर्फ बहुत जल्द ही सिर्फ एक विलासिता की चीज से बदलकर एक बेहद जरूरी चिकित्सीय साधन बन गई। औपनिवेशिक डॉक्टर इसे तेज बुखार कम करने, हैजा का इलाज करने और सर्जरी के दौरान सुन्‍न करने वाले एनेस्थीसिया के तौर पर इस्तेमाल करने की सलाह देते थे।
भारत की कठोर जलवायु में यूरोपीय आबादी को जिंदा और स्वस्थ रखने के लिए इसे एक बेहद जरूरी चीज माना जाता था।

4. लॉजिस्टिकल इनोवेशन

बोस्टन के व्यापारी फ्रेडरिक ट्यूडर (जिन्हें बाद में 'आइस किंग' का खिताब मिला) ने बड़े पैमाने पर बर्फ को सुरक्षित रखने की कला में महारत हासिल कर ली थी।

उन्होंने वाल्डेन तालाब जैसे ताजे पानी के स्रोतों से बर्फ निकाली। घोड़ों से चलने वाले बर्फ के हल का इस्तेमाल करके उसे एक जैसे, आपस में जुड़ने वाले टुकड़ों में काटा। फिर उन्हें जहाजों के अंदरूनी हिस्सों में कसकर पैक किया। इन हिस्सों को लकड़ी के बुरादे, चावल के छिलके और टैनबार्क की दोहरी दीवारों से सुरक्षित बनाया गया था।

5. औपनिवेशिक विशेषाधिकार

यह समझते हुए कि संभ्रांत वर्ग को इसकी कितनी जरूरत है, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने ट्यूडर की बर्फ की खेपों को पूरी तरह से ड्यूटी-फ्री दर्जा दिया। उन्हें जहाजों के रुकने के लिए प्राथमिकता वाले स्थान दिए। बर्फ को पिघलने से बचाने के लिए रात में उतारने की अनुमति दी। कलकत्ता, बंबई और मद्रास में 'आइसहाउस' (बर्फ रखने के लिए विशेष रूप से बनाए गए सुरक्षित गोदाम) बनाने के लिए बहुत कम दरों पर जमीन पट्टे पर दी।

भारत ने कितनी कीमत चुकाई?

जब बर्फ से भरा पहला जहाज 'टस्कनी' 6 सितंबर 1833 को कलकत्ता पहुंचा तो वह बोस्टन से 180 टन बर्फ लेकर निकला था। वह 100 टन बर्फ के साथ पहुंचा। यह बर्फ के सुरक्षित रहने की एक अविश्वसनीय 55% दर थी।
इस ऐतिहासिक व्यापार का वित्तीय ब्योरा दिखाता है कि 'सफेद सोना' (व्‍हाइट गोल्‍ड) का यह कारोबार कितना ज्‍यादा मुनाफे वाला बन गया था:

1833 (पहली खेप): बर्फ शुरू में 6.5 सेंट प्रति पाउंड (या लगभग 4 आने / 6 पेंस प्रति दो पाउंड) की दर से बेची गई थी।
1853 (मांग अपने चरम पर): जैसे-जैसे बर्फ एक नई चीज से बदलकर जीवनशैली का एक जरूरी हिस्सा और चिकित्सा की एक जरूरत बन गई, इसकी मांग आसमान छूने लगी। खेपों की मात्रा में बढ़ोतरी के बावजूद खुदरा कीमत बढ़कर 12 सेंट प्रति पाउंड हो गई, क्योंकि यह सामाजिक प्रतिष्ठा का सबसे बड़ा प्रतीक बन गई थी।

मुनाफे का अंतर

1833 की उस पहली ऐतिहासिक यात्रा में जहाज के मालिकों ने कुल 12,500 डॉलर (लगभग 11,87,408 रुपये) का राजस्व कमाया। कारण था कि बर्फ खुद जमे हुए तालाबों से मुफ्त में निकाली गई थी। जहाज के माल ढोने वालों ने बर्फ को जहाज का संतुलन बनाए रखने वाले वजन के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए भारी छूट दी थी। इसलिए इस यात्रा पर कुल निवेश 500 डॉलर (लगभग 47,496 रुपये) से ज्‍यादा नहीं हुआ।

20 साल के दौरान फ्रेडरिक ट्यूडर ने अकेले कलकत्ता के बाजार से लगभग 220,000 डॉलर (20.9 लाख रुपये) का शुद्ध मुनाफा कमाया। यह आज की करेंसी में 60 लाख डॉलर (56.9 करोड़ रुपये) से ज्‍यादा की दौलत है। 1856 से 1882 के बीच 353,000 टन से ज्‍यादा अमेरिकी बर्फ दक्षिण/पूर्वी एशिया और ऑस्ट्रेलिया भेजी गई।



समंदर के रास्ते होने वाला यह शानदार बर्फ का व्यापार 1870 के दशक के आखिर में धीरे-धीरे खत्म हो गया। कमर्शियल मैकेनिकल रेफ्रिजरेशन के आविष्कार से बंगाल आइस कंपनी (1878 में स्थापित) जैसी स्थानीय फैक्टरियों को कलकत्ता और बंबई में ही बर्फ बनाने की सुविधा मिल गई।

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