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पेट्रोल-डीजल की कीमतें दबाए रख पाना मुश्किल, आईएमएफ ने भारत से की यह अपील

Updated on 08-05-2026 12:03 PM
नई दिल्‍ली: चार राज्यों में विधानसभा चुनाव खत्म हो गए हैं। लोगों का ध्यान दोबारा एक बड़ी आर्थिक चिंता की ओर जाने लगा है। वह है ईंधन की कीमतें। ऐसी अटकलें तेल हैं कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में जल्द ही बढ़ोतरी हो सकती हैं। वैसे तो सरकार लगातार इन दावों को खारिज करती रही है। लेकिन, कीमतों पर इस तरह के कंट्रोल को कब तक बनाए रखा जा सकेगा, इस पर अब सवाल उठने लगे हैं। मिडिल ईस्‍ट में लंबे समय से जारी जियोपॉलिटिकल टेंशन के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर हैं। इस बीच अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भारत से अपील की है कि वह ग्‍लोबल वास्‍तविकताओं के आधार पर ईंधन की कीमतों को तय होने दे। लंबे समय तक इन्‍हें जबरन दबाए रख पाना मुमकिन नहीं है।

क्रूड का बदल चुका है पूरा गणित

  • कच्चे तेल की कीमतें ईरान संकट से पहले लगभग 70 डॉलर के आसपास थीं।
  • अब क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर के पार पहुंच गई हैं।
  • एक समय तो ये 126 डॉलर तक भी चली गई थीं।
  • इस अचानक हुई बढ़ोतरी ने सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों पर भारी बोझ डाल दिया है।
  • इन कंपनियों ने खुदरा कीमतों को स्थिर बनाए रखने के लिए बढ़ी हुई लागत का बोझ खुद उठाया है।
  • इससे उन्हें लगातार वित्तीय नुकसान हो रहा है।

न्‍यूज एजेंसी पीटीआई की हालिया रिपोर्ट में सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया गया था कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से इनकार नहीं किया जा सकता। इस बीच, सरकारी ईंधन खुदरा विक्रेताओं ने पहले ही कमर्शियल एलपीजी, इंडस्ट्रियल डीजल, 5 किलो वाले एलपीजी सिलेंडर और अंतरराष्ट्रीय एयरलाइनों के लिए जेट ईंधन की कीमतें बढ़ा दी हैं ताकि वे बढ़ती लागत के हिसाब से तय हो सकें।
जहां एक ओर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हुई हैं। वहीं घरेलू एलपीजी की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। हालांकि, कमर्शियल एलपीजी (19 किलो) की कीमत में हाल ही में अचानक 993 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। यह इस बात का संकेत है कि कुछ खास क्षेत्रों में कीमतों में बदलाव का सिलसिला पहले ही शुरू हो चुका है।

IMF ने मार्केट-ड्रिवन प्राइसिंग पर दिया जोर

इन घटनाक्रमों के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भारत से अपील की कि वह ईंधन की कीमतों को ग्‍लोबल मार्केट की वास्तविकताओं के अनुरूप तय होने दे। आईएमएफ का तर्क है कि कीमतों को आर्टिफिशियल रूप से कम रखना लंबे समय तक संभव नहीं हो सकता।
TOI की रिपोर्ट के अनुसार, NCAER की ओर से आयोजित कार्यक्रम में आईएमएफ के डायरेक्‍टर (एशिया-प्रशांत) कृष्णा श्रीनिवासन ने कहा, 'सरकार ने तेल पर एक्‍साइज टैक्‍स में कटौती की है। उर्वरक पर कुछ सब्सिडी भी दी है। यह कुछ समय तक तो चल सकता है। लेकिन, राजकोषीय गुंजाइश को देखते हुए इसे बहुत लंबे समय तक जारी रखना संभव नहीं है। किसी न किसी मोड़ पर आपको कीमतों को बाजार के संकेतों के अनुसार तय होने देना ही होगा। और यह बात भारत के संदर्भ में भी पूरी तरह सच है।'उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कीमतों में बढ़ोतरी से सप्‍लाई में कमी के दौरान मांग को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, उन्होंने कमजोर तबके के लोगों के लिए टारगेटेड सब्सिडी देने की भी सिफारिश की।

हालांकि, ऐसा लगता है कि सरकार आईएमएफ के इस आकलन से सहमत नहीं है। आरबीआई की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने भारत की मजबूत राजकोषीय स्थिति पर जोर देते हुए कहा कि 2026 में जीडीपी के 83.4% से घटकर 2031 में कुल कर्ज 77.7% होने का अनुमान है।

उन्होंने समझदारी भरे राजकोषीय प्रबंधन, प्रभावी एकीकरण और मजबूत आर्थिक विकास को उन फैक्‍टरों के तौर पर बताया जो भारत की सहनशीलता को मजबूत करते हैं। गुप्ता ने यह भी कहा कि आईएमएफ ने पहले भारत के विकास के रास्ते का कम अनुमान लगाया था।

आईएमएफ क्यों चाहता है कि बढ़ें कीमतें?

आईएमएफ का यह नजरिया आर्थिक बुनियादी बातों पर आधारित है। उसका मानना है कि ग्‍लोबल सप्‍लाई और डिमांड में संतुलन बनाने के लिए ईंधन की कीमतों को बढ़ने देना जरूरी है।

रोड्रिगो वाल्डेस ने इस नजरिए को साफ तौर पर समझाया: 'हमारे पास तेल नहीं है। हमारे पास ऊर्जा नहीं है। ऊर्जा सभी के लिए ज्‍यादा महंगी होनी चाहिए ताकि बदलाव हो सके और हम कम खपत करें।'

उन्होंने आगे चेतावनी दी, 'यह एक ग्‍लोबल शॉक है। अगर देश कीमतों के संकेतों को दबाते हैं तो वैश्विक कीमतें और बढ़ जाएंगी।'

जताई यह चिंंता

चिंता की बात यह है कि अगर बड़ी अर्थव्यवस्थाएं सब्सिडी या कीमतों की सीमा तय करके उपभोक्ताओं को बचाती हैं तो ग्‍लोबल डिमांड बनावटी तौर पर ज्‍यादा बनी रहती है। इससे सप्‍लाई की कमी और बढ़ जाती है। कीमतें ऊंची बनी रहती हैं।

आम धारणा के उलट आईएमएफ बिना रोक-टोक कीमतों में बढ़ोतरी की वकालत नहीं कर रहा है। इसके बजाय वह व्यापक सब्सिडी और लक्षित सहायता के बीच फर्क करता है। जहां पहली चीज खपत के तरीकों को बिगाड़ती है। वहीं दूसरी चीज सरकारों को बाजार के संकेतों में दखल दिए बिना असर को कम करने की सहूलियत देती है।

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