'एक ऐसी बात जिसका इकरार करते हुए मेरी जुबां पर छाले पड़ जाएंगे', 3 प्रड्यूसर्स के सामने बोले थे राजेश खन्ना
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18-07-2026 01:54 PM
1960 के दशक में जब हिंदी सिनेमा पर कई बड़े और बेहतरीन एक्टर छाए हुए थे। एक तरफ ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार तो दूसरी तरफ लाजवाब राज कपूर और जुबली कुमार राजेंद्र कुमार का स्क्रीन करिश्मा। वहीं, देव आनंद सदा बहार, 'हीमैन' धर्मेंद्र, जपिंग जैक जितेंद्र और देशभक्ति की छवि लिए मनोज कुमार थे। ऐसे में लगभग 1960 के दशक के मध्य में एंट्री हुई एक ऐसे स्टार की, जिसकी एक्टिंग, जिसकी फिल्मों के गाने सब दर्शकों पर ऐसा जादू करते हैं कि उसको हिंदी सिनेमा का पहला सुपरस्टार घोषित किया जाता है। बात हो रही है जतिन खन्ना, जिनको असल पहचान मिली राजेश खन्ना के नाम से और जो फिल्मी वर्ल्ड में 'काका' कहलाए।
'जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं। मौत के डर से जिंदा रहना छोड़ दिया तो मौत किसे कहते हैं। जब तक जिंदा हूं, मरा नहीं। जब मर गया तो मैं ही नहीं।' 29 दिसंबर 1942 को अमृतसर में जन्मे राजेश खन्ना को एक्टिंग का शौक पहले से ही था, पर फिल्मों में एंट्री तब हुई, जब उन्होंने एक बहुत बड़े स्तर पर हुई कॉम्पिटिशन में भाग लिया।
राजेश खन्ना ने अखबार में प्रतियोगिता का विज्ञापन देखा, कैंची से उसे काटा, फॉर्म भरा
करीब 10 हजार प्रतिभागियों में से जो कुछ चुने गए, उनमें राजेश खन्ना भी थे। राजेश खन्नों के शब्दों में कहें, जब वे फिल्मों में आए, उनका कोई गॉडफादर नहीं था। फिल्म इंडस्ट्री में उनका कोई रिश्तेदार नहीं था। कोई सिर पर हाथ रखने वाला नहीं था। उनकी किस्मत का दरवाजा यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स-फिल्मफेयर टैलेंट कॉन्टेस्ट से खुला। उन्होंने अखबार में प्रतियोगिता का विज्ञापन देखा। कैंची से उसे काटा, फॉर्म भरा और तीन तस्वीरें भेज दीं। कुछ दिनों बाद बुलावा आया।
प्रड्यूसर्स ने पूछा- जो डायलॉग भेजा था, याद किया?
सामने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े निर्माता बैठे थे। बीआर चोपड़ा, बिमल रॉय, शक्ति सामंत जैसे दिग्गज। एक समय राजेश खन्ना को भी लगा था कि जैसे उनका कोर्ट मार्शल हो रहा हो। सामने सिर्फ एक कुर्सी थी, जिस पर वे अकेले बैठे थे। प्रड्यूसर्स ने पूछा कि 'जो डायलॉग भेजा था, याद किया?' उन्होंने जवाब दिया- डायलॉग तो पढ़ लिया लेकिन आपने यह नहीं बताया कि किरदार कैसा है। मां कैसी है? बेटा कैसा है? अमीर हैं या गरीब? मिडिल क्लास हैं? पढ़े-लिखे हैं? बिना किरदार समझे डायलॉग कैसे बोलूं?' चोपड़ा साहब बोले, 'ये सवाल कोई थिएटर का कलाकार ही पूछ सकता है। अच्छा, अब अपना कोई डायलॉग सुनाओ।'
'एक ऐसी बात जिसका इकरार करते हुए मेरी जुबां पर छाले पड़ जाएंगे'
राजेश खन्ना और ज्यादा घबरा गए। अब काटो तो खून नहीं, पसीना छूट रहा था। उन्हें अचानक एक नाटक का डायलॉग याद आया, जिसे उन्होंने मंच पर निभाया था। और फिर उन्होंने वह डायलॉग बोला, जिसने उनकी जिंदगी बदल दी। उन्होंने ये सुनाते हुए कहा, 'हां मैं कलाकार हूं। क्या करोगे मेरी कहानी सुनकर। आज से कई साल पहले होने के बकाने से एक ऐसा प्याला पी चुका हूं, जो मेरे लिए जहर, औरों के लिए अमृत है। एक ऐसी बात जिसका इकरार करते हुए मेरी जुबां पर छाले पड़ जाएंगे, लेकिन फिर भी कहता हूं कि जब मैं छोटा था, एक खौफनाफ वाकया पेश आया कि मैं भयानक आग में मैं फंस गया।'
जो फिल्में की उनसे उन्हें एकदम से बड़ी कामयाबी तो नहीं मिली
राजेश खन्ना ने अपने आखिरी मेसेज में बताया था कि ये वो डायलॉग है, जिसकी वजह से वे फिल्मों में आए और जीपी सिप्पी ने मौका दिया था। यहां से एक स्ट्रगलर थिएटर आर्टिस्ट का सफर फिल्मों तक पहुंचा। फिल्म 'आखिरी खत' से फिल्मी सफर की शुरुआत करने वाले राजेश खन्ना, शुरू-शुरू में जो फिल्में की उनसे उन्हें एकदम से बड़ी कामयाबी तो नहीं मिली, लेकिन एक एक्टर के तौर पर अपने आपको फिल्म जगत में बनाए रखने में सफल हुए।
राजेश खन्ना डबल रोल में दिखे और गाने भी जबरदस्त हिट हुए
'मेरे सपनों की रानी, कब आएगी तू? आयी रुत मस्तानी, कब आएगी तू? बीती जाए जिंदगानी, कब आयेगी तू? चली आ, तू चली आ।' फिर आई वो फिल्म, जिसने एक तरीके से बॉलीवुड का रुख ही बदल दिया था और हिंदी सिनेमा के रोमांटिक किंग को जन्म दिया, जिनकी छवि को आज तक कोई पछाड़ नहीं पाया। 'गुनगुना रहे हैं भंवरे, खिल रही है कली-कली। गुनगुना रहे हैं भंवरे, खिल रही है कली-कली।' यह शक्ति सामंत की फिल्म 'आराधना' थी, जिसमें राजेश खन्ना डबल रोल में दिखे और गाने भी जबरदस्त हिट हुए। इसके बाद राजेश खन्ना की हिट फिल्मों का दौर चला। हर फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा रही थी। ब्लॉकबस्टर फिल्में देखने को मिल रही थीं और 'काका' का जादू सबके सिर पर चढ़कर बोलने लगा था।
अपने आखिरी समय में वे कैंसर से जूझते रहे
'गोरे रंग पे ना इतना गुमान कर, गोरा रंग दो दिन में ढल जाएगा।' हर तरफ इनकी ही फिल्में और उन गानों की धुन। जिस तरह मुकेश साहब को राज कपूर की वॉइस कहा जाता था, ठीक वैसे ही किशोर कुमार राजेश खन्ना की आवाज बन गए और कई सारे हिट गाने दिए। लोग उनकी एक्टिंग की कॉपी करने लगे थे। उन्हें राजेश खन्ना हर किरदार में अच्छे लगे। अपने लंबे करियर में उन्होंने तीन फिल्मफेयर पुरस्कार जीते। फिल्मों के बाद वे राजनीति में भी आए और 1992 से 1996 तक कांग्रेस सांसद के रूप में लोकसभा का प्रतिनिधित्व भी किया। अपने आखिरी समय में वे कैंसर से जूझते रहे और आखिर में 18 जुलाई 2012 को उनका निधन हो गया।
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