मुनिश्री ने कहा कि रक्षाबंधन के अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति को आत्मचिंतन करते हुए यह विचार करना चाहिए कि वह अपने धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए क्या योगदान दे सकता है। साधर्मियों के प्रति वात्सल्य और सेवा की भावना को व्यवहार में उतारना ही इस पर्व की वास्तविक सार्थकता है।