'दुनिया में शांतिदूत और घर में हिंसा', PoK में पाकिस्तानी आर्मी के दमन ने खोली असीम मुनीर के ढोंग की पोल
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29-06-2026 01:35 PM
इस्लामाबाद: पाकिस्तान के आर्मी चीफ, फील्ड मार्शल आसिम मुनीर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को शांतिदूत के तौर पर पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर देश के अंदर आम लोगों के खिलाफ दमनकारी कार्रवाईयों का सहारा कर रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण पीओके में देखने को मिला है, जिसे पाकिस्तान 'आजाद कश्मीर' कहता है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में हिंसा आम बात रही है और अब पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में भी कई जगहों पर बाहरी (पाकिस्तान सेना) शासन से आजादी की मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं।
संघर्ष वाले इन तीनों इलाकों में पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान सीधे तौर पर भारत पर आरोप लगाता है कि भारत, इजरायल के साथ मिलकर उसे अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है। असलियत यह है कि भारत के खिलाफ छद्म युद्ध (प्रॉक्सी वॉर) छेड़ने के लिए पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में जो आजादी-समर्थक भावना भड़काई थी, वही उस पर भारी पड़ रही है। पाकिस्तान को एहसास हो रहा है कि यह भावना PoK में जोर पकड़ रही है।
पीओके में भारी अत्याचार
पीओके में अब तक कम से कम बीस प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया गया है। हजारों प्रदर्शनकारी PoK के रावलकोट में अब प्रतिबंधित हो चुकी 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) के बैनर तले धरना दे रहे हैं। वहीं गिरफ्तारी के डर से JAAC के नेता भूमिगत हो गए हैं।
पुलिस की सख्ती के कारण मुजफ्फरबाद तक मार्च करने का आह्वान फिलहाल रोक दिया गया है। PoK में पूरी तरह से हड़ताल चल रही है। पाकिस्तानी सरकार ने इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं। प्रदर्शनकारियों पर विरोध खत्म करने का दबाव बनाने के लिए सरकार ने भोजन, दवा और ईंधन की आपूर्ति रोक दी है।
पाकिस्तान का 1947 वाला तरीका
दिलचस्प बात यह है कि सितंबर 1947 में भी पाकिस्तानी सरकार ने यही तरीका अपनाया था ताकि महाराजा हरि सिंह को 'स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट' (यथास्थिति समझौता) पर हस्ताक्षर करने के बाद पाकिस्तान में शामिल होने के लिए मजबूर किया जा सके। अब ये हो रहा है कि मीडिया में प्रदर्शनकारियों को बदनाम करते हुए उन्हें देशद्रोही और भारतीय एजेंट कहा जा रहा है। इस अभियान की अगुवाई पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ कर रहे हैं।
कश्मीर को लेकर भारत के साथ हुई विभिन्न लड़ाइयों में पाकिस्तान को हुए नुकसान का जिक्र करते हुए उन्होंने PoK के लोगों को अहसान फरामोश करार दिया। उन्होंने यह दावा करके चीजें खराब कर दीं कि रावलकोट में विरोध करने वाले लोग मूल कश्मीरी नहीं हैं। उनका यह दावा भी पूरी तरह ठीक नहीं है कि प्रवासियों के लिए आरक्षित बारह विवादित सीटों पर चुने जाने वाले लोग ही असली कश्मीरी हैं। असल में कश्मीर घाटी और जम्मू इलाके के कुछ मुसलमान पाकिस्तान चले गए थे और उन्होंने कश्मीर के पाकिस्तान में विलय का समर्थन किया था।
ख्वाजा आसिफ का दावा गलत
ख्वाजा आसिफ जम्मू-कश्मीर के भारतीय हिस्से से आए प्रवासियों के लिए आरक्षित उन 12 विवादित सीटों को सही ठहराने की कोशिश कर रहे थे। ये सीटें इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के लिए सरकार बनाने की प्रक्रिया में हेरफेर करने और संघीय स्तर पर सत्ताधारी पार्टी का पक्ष लेने में काम आती हैं। 53 सदस्यों वाली विधानसभा में ये सीटें किसी भी सरकार का भविष्य तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं। इसीलिए 27 जुलाई को होने वाले चुनावों से पहले इन सीटों को खत्म करना प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में से एक है। इन सीटों के लिए वोटिंग पाकिस्तान के अलग-अलग शहरों में होती है।
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