मंदोदरी की आस्था से जुड़ा मेरठ का बिल्वेश्वर नाथ मंदिर प्रशासनिक निगरानी में, कोर्ट आदेश पर तहसीलदार बने रिसीवर
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26-05-2026 12:54 PM
मेरठ: उत्तर प्रदेश में मेरठ के सदर बाजार क्षेत्र स्थित ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले बिल्वेश्वर नाथ मंदिर परिसर को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद अब प्रशासनिक हस्तक्षेप तक पहुंच गया है। न्यायालय के आदेश के बाद जिला प्रशासन ने सदर तहसीलदार रवि प्रजापति को मंदिर का रिसीवर नियुक्त कर दिया है। प्रशासनिक टीम ने मौके पर पहुंचकर मंदिर की संपत्ति, दानपात्र, पूजा सामग्री और अभिलेखों को अपने नियंत्रण में लेकर रिसीवर के सुपुर्द कर दिया।
रविवार को जिलाधिकारी के निर्देश पर अपर नगर मजिस्ट्रेट (ACM) दीपक माथुर, तहसीलदार सदर रवि प्रजापति और स्थानीय थाना पुलिस बल के साथ मंदिर परिसर पहुंचे। दोनों पक्षों की मौजूदगी में मंदिर का निरीक्षण किया गया और वहां रखे दानपात्र, चांदी का रथ, पूजा सामग्री, पंखे, कुर्सियां और अन्य सामान प्रशासनिक निगरानी में लिया गया। मंदिर परिसर के कुछ कमरों को भी सीलनुमा निगरानी में रखा गया है
रामायण काल और मंदोदरी से जुड़ी मान्यता
बिल्वेश्वर नाथ मंदिर को लेकर स्थानीय स्तर पर गहरी धार्मिक और ऐतिहासिक मान्यताएं प्रचलित हैं। मंदिर परिसर में भारतीय पुरातत्व विभाग का बोर्ड भी लगा हुआ है। इतिहासकारों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह स्थल रामायण काल से जुड़ा माना जाता है। कहा जाता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी यहां स्थित शिवालय में पूजा-अर्चना करने आती थीं और भगवान शिव के आशीर्वाद से उन्हें रावण जैसा विद्वान और पराक्रमी पति मिला। इसी मान्यता के चलते मेरठ को रावण की ससुराल भी कहा जाता है।
मंदिर प्रबंधन विवाद बना तनाव की वजह
सदर स्थित इस परिसर में बिल्वेश्वर मंदिर, श्री जगन्नाथ मंदिर और बालाजी मंदिर मौजूद हैं। बिल्वेश्वर मंदिर को वर्ष 1967 में राज्य संरक्षित घोषित किया गया था। लेकिन पिछले करीब दो वर्षों से श्री जगन्नाथ मंदिर के प्रबंधन और संचालन को लेकर विवाद लगातार गहराता गया।
एक पक्ष में मंदिर के पुजारी पंडित गणेश शर्मा और विष्णु शर्मा हैं, जबकि दूसरे पक्ष में श्री जगन्नाथ स्वामी मंदिर समिति और सेवा ट्रस्ट के पदाधिकारी शामिल हैं। वर्ष 2025 में जगन्नाथ रथयात्रा और बलदेव छठ के दौरान प्रसाद चढ़ाने को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद इतना बढ़ गया था कि हाथापाई तक की नौबत आ गई थी। उस दौरान कैंट विधायक अमित अग्रवाल समेत कई जनप्रतिनिधियों के सामने भी हंगामे की स्थिति बनी थी।
कोर्ट आदेश के बाद प्रशासनिक कार्रवाई
प्रशासन के अनुसार धारा 145 के तहत चल रहे विवाद और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका को देखते हुए यह कदम उठाया गया। मंदिर समिति और सेवा ट्रस्ट ने पुजारियों पर मंदिर परिसर को निजी कार्यालय की तरह इस्तेमाल करने और व्यावसायिक गतिविधियां संचालित करने के आरोप लगाए थे।वहीं, पुजारी पक्ष ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। पुजारी गणेश शर्मा, विष्णु शर्मा और एडवोकेट राशि शर्मा का कहना है कि जब विवाद कुछ व्यक्तियों के बीच था तो सार्वजनिक मंदिर की संपत्ति और पूजा व्यवस्था को प्रशासनिक कब्जे में लेना उचित नहीं है।
ACM बोले- शांति व्यवस्था बनाए रखना जरूरी
अपर नगर मजिस्ट्रेट दीपक माथुर ने कहा कि मंदिर प्रबंधन को लेकर लंबे समय से तनाव बना हुआ था और इससे कभी भी कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती थी। इसी को देखते हुए न्यायालय के आदेश पर तहसीलदार को रिसीवर नियुक्त किया गया है, ताकि मंदिर परिसर में शांति और पारदर्शिता बनी रहे।
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