जो कुदर्शन ध्यान का भागी रहता है वह अनुकूलता के राग से घिरे रहता है। मिथ्यात्व की पीड़ा में फंसे रहता है। अपने धर्म और संस्कृति से दूर होकर कुदर्शन के कारण अपने ही धर्म और संस्कृति का निंदक हो जाता है। कुदर्शन ध्यान से बचना ही होगा। ये कुदर्शन ध्यान ही अन्य दर्शन का अनुरागी बना देगा। बोध को प्राप्त करना है, अन्य दर्शन को प्राप्त नहीं करना है।